रंगा सियार

रंगा सियार

नदी किनारे रहता था एक लाल रंगा सियार
खुद को समझे बड़ा सियाना, सबको मूरख यार।

एक दिन गलती से मुझसे वो आ टकराया
लगा अकड़ने, मुझको अपना ज्ञान दिखलाया।

बोला तुमको समझ नही कुछ, हो तुम निपट गंवार
मुझसे सीखो, सीख सको तुम कैसा जग व्यवहार।

नहीं उलझना कभी भी मुझ से मैं हूं बड़ा ही ज्ञानी
तर्क कुतर्क में बदल दिखाता, समझ ले तू अज्ञानी।

अपने मुंह मिट्ठू बन जाना खूब मुझे है आता
इतना ज्ञान भरा है मुझमें, अब नहीं सीखा जाता।

जब भी मुझको दिखे आइना, दंभ है आड़े आता
नहीं सत्य है मुझे देखना, बस मन मेरा घबराता।

मेरी तुलना ऐसी जैसे, हो खजूर का झाड़
रेगिस्तान में भी छाया न दूं, कांटे तन में कई हजार।

मैं हूं उस बंदर के जैसा, भीग भीग खिसयाए
खुद का नहीं कोई ठिकाना, घोंसला तोड़ तोड़ इतराए।

सुन कर उसकी कुंठित वाणी, मन मेरा हर्षाया
कुकुर के भोंके, गज ना डरता, मस्त चाल घर आया।

भूल गया वो बात पते की, जो जग ने है जानी
जाकी रही भावना जैसी, वैसी बोले वाणी।।

आभार – नवीन पहल – १४.११.२०२३ 😜😜
नोट: ये रचना कवि के निजी अनुभवों पर आधारित है, इसलिए किसी व्यक्ति विशेष से समानता संभव है, परंतु इसे सिर्फ हास्य की दृष्टि से ही लिखा गया है 🙏🙏

# दैनिक प्रतियोगिता हेतु कविता 


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4 Comments

Gunjan Kamal

16-Nov-2023 09:43 PM

👏👌

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बेहतरीन अभिव्यक्ति

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Sarita Shrivastava "Shri"

15-Nov-2023 01:21 PM

वाह! बेहतरीन सुन्दर विचार प्रस्तुति👌👌🌹🌹

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